बाथू की लड़ी मंदिर
श्रेणी
अन्य, ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक / मनोहर सौंदर्य
बाथू की लड़ी मंदिर (जिसे बाथू मंदिर भी कहा जाता है) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित प्राचीन हिंदू मंदिरों का एक अनोखा समूह है। ये मंदिर साल के लगभग ८ महीने महाराणा प्रताप सागर (पोंग डैम) के पानी में डूबे रहते हैं और जब पानी का स्तर कम होता है, तब ही ये दिखाई देते हैं।
क्यों है ये खास?
- ये मंदिरों का समूह (लगभग ६-८ मंदिर) है, जिनमें मुख्य मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है।
- ये मंदिर पारंपरिक नागर शैली में बने हुए हैं और स्थानीय “बाथू” पत्थर से निर्मित हैं।
- पोंग डैम बनने (1970 के दशक) के बाद ये ज्यादातर समय पानी के नीचे रहते हैं।
- ये मंदिर मार्च से जून महीने के बीच सबसे अच्छे दिखते हैं (खासकर मई-जून में)।
- स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार ये मंदिर पांडवों द्वारा बनवाए गए थे। कहा जाता है कि पांडव स्वर्ग जाने के लिए सीढ़ी बनाते समय यहाँ रुके थे। कुछ इतिहासकार इन्हें ८वीं-९वीं शताब्दी या उससे पहले का मानते हैं।
- “बाथू की लड़ी” नाम का मतलब है — बाथू पत्थर की लड़ी (chain), क्योंकि मंदिर एक लड़ी की तरह बने हुए हैं।
स्थान (Location)
- कांगड़ा जिले में जवाली (Jawali) के पास।
- धमेता (Dhameta) गाँव से लगभग ३ किमी दूर।
- धरमशाला/कांगड़ा से लगभग ६०-६७ किमी।
- पठानकोट से लगभग ८० किमी दूर।
कैसे पहुँचें?
- सड़क मार्ग: जवाली या धमेता तक बस/टैक्सी से जाएँ। वहाँ से स्थानीय रास्ता मंदिर की ओर जाता है।
- नाव से: जब पानी कम होता है, तो धमेता या नागरोटा सुरियाँ से नाव की सवारी करके मंदिर तक जा सकते हैं।
- निकटतम एयरपोर्ट: गग्गल (कांगड़ा) एयरपोर्ट या पठानकोट।
- ट्रेन द्वारा: निकटतम रेलवे स्टेशन जवाली है, पठानकोट से जवाली स्टेशन तक ट्रेन लें (नैरो गेज)।
सबसे अच्छा समय: मार्च से जून (खासकर मई-जून) जब मंदिर पानी से बाहर निकलते हैं। बाकी महीनों में ये पूरी तरह पानी में डूबे रहते हैं।