नूरपुर का किला
नूरपुर किला (पूर्व धमेरी किला के नाम से भी जाना जाता था) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में नूरपुर शहर में स्थित एक ऐतिहासिक खंडहर किला है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक है और पठानिया राजपूतों की समृद्ध विरासत का गवाह है।
इतिहास
इस किले की नींव 11वीं शताब्दी (लगभग 1064 ई.) में पड़ी थी, जब नूरपुर राज्य (जिसे पहले धमेरी कहा जाता था) की स्थापना दिल्ली के शासकों से संबंधित तोमर राजपूत राजा ज्हेत पाल (या जीत पाल) ने की थी। पठानिया वंश ने इस क्षेत्र पर कई शताब्दियों तक शासन किया।
मुगल सम्राज्ञी नूरजहाँ जब इस स्थान पर आईं और इसकी सुंदरता से मुग्ध हो गईं, तब इस शहर का नाम नूरपुर पड़ा। 16वीं शताब्दी के अंत और 17वीं शताब्दी की शुरुआत में राजा बासु देव तथा उनके उत्तराधिकारियों के समय में यह किला अपने चरम पर पहुँचा। इस किले ने कई युद्ध, मुगल प्रभाव, ब्रिटिश काल और 1905 के भूकंप में काफी क्षति देखी।
किले के परिसर में महलों, दरबारों और अन्य संरचनाओं के अवशेष मौजूद हैं। किले के अंदर 16वीं शताब्दी में निर्मित ऐतिहासिक बृजराज स्वामी मंदिर (बृजराज मंदिर) है। यह मंदिर इसलिए अनोखा है क्योंकि यह उन गिने-चुने स्थानों में से एक है जहाँ भगवान कृष्ण और मीरा बाई की मूर्तियों की एक साथ पूजा की जाती है। मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीला को दर्शाती सुंदर नक्काशी है।
वास्तुकला और विशेषताएँ
- किला सामरिक रूप से एक पहाड़ी/चट्टान पर बनाया गया है, जो जब्बर नदी की ओर देखता है। यहाँ से आसपास के क्षेत्र और दूर की पहाड़ियों के खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं।
- इसमें हिंदू और मुगल वास्तुकला शैली का सुंदर मिश्रण है। दीवारों पर जटिल पत्थर की नक्काशी, बेस-रिलीफ और फीकी पड़ चुकी मिनिएचर पेंटिंग्स हैं।
- परिसर में कभी राजसी कक्ष, दीवान-ए-खास (दरबार हॉल), प्रशासनिक क्षेत्र और बाद के समय में जेल भी शामिल थी।
- एक खास विशेषता है प्राचीन मौलश्री का पेड़ (कुछ कथाओं के अनुसार 400 वर्ष से अधिक पुराना) और परिसर के अंदर पानी के छोटे जलाशय।
- वर्तमान में किला खंडहर हालत में है, लेकिन अपनी आकर्षक सुंदरता बनाए हुए है। इसकी मोटी दीवारें अब भी कई जगहों पर खड़ी हैं।
स्थान और वातावरण
नूरपुर किला हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के उत्तर-पश्चिमी भाग में नूरपुर शहर में स्थित है। यह पंजाब-हिमाचल सीमा के पास सुविधाजनक जगह पर है, चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है और panoramic दृश्य प्रदान करता है।
समय और प्रवेश
- किला सामान्यतः सुबह से शाम तक खुला रहता है (लगभग सुबह 9 बजे से शाम 5/6 बजे तक)।
- प्रवेश आमतौर पर मुफ्त है (कुछ जगहों पर नाममात्र शुल्क हो सकता है, कृपया स्थल पर पुष्टि करें)।
- किले के अंदर स्थित बृजराज स्वामी मंदिर पूजा-अर्चना के लिए सक्रिय है।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग से: पठानकोट (पंजाब) से लगभग 25–28 किमी, धर्मशाला से 60 किमी और कांगड़ा शहर से करीब 40–50 किमी। पठानकोट–नूरपुर–धर्मशाला हाईवे से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग से: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन पठानकोट जंक्शन (लगभग 25–30 किमी) है। कांगड़ा घाटी रेलवे पर छोटा नूरपुर रोड स्टेशन भी है।
- वायु मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा गग्गल एयरपोर्ट (कांगड़ा/धर्मशाला) लगभग 45–50 किमी दूर है, या पठानकोट एयरपोर्ट (25–30 किमी) जो थोड़ा निकट है।